नए कलाम लिखेंगे व गुनगुनाएँगे
दिल-ए-अज़ीज़ तुझे इस तरह मनाएँगे
तिरे यूँ छोड़ के जाने पे इक सवाल मिरा
बग़ैर तेरे अकेले किधर को जाएँगे
हमारे तन पे उदासी के रंग दिखते हैं
कोई बताए इन्हें किस तरह छुपाएँगे
हम आ रहे हैं सनम आज तेरे कूचे में
तेरे ही लोग हमें रास्ता बताएँगे
ख़ुदा नज़र तो ज़रा फेर अपने बंदों पर
दिया उमीद का वो कब तलक जलाएँगे
बुझा रहे हैं अभी हम तो अपना सोज़-ए-ग़म
बिरह की आग तिरी फिर कभी बुझाएँगे
— Shivang Tiwari















