"हिसाब"
मेरे चुभते क़िस्सों की किताबों में
दबे मिलेंगे तुम्हें कुछ गुलाब भी
मैं ने इश्क़ में यादों के साथ
रखा है सारा हिसाब भी
जिस महफ़िल में हया लुटाई
उस को है मेरा आदाब भी
रस रहे शायरियों तक बस
मेरी नज़्मों से टपके शराब भी
जलते हैं शाइ'र शायद इस लिए
जो मैं आफ़ताब के साथ लिखता चाँद भी
फ़क़त जिस्म तक न रहे इश्क़ हमारा
तू सीने से लगा सके मेरी लिखी नज़्म भी
— Shivang Tiwari















