रात के बा'द फिर रात आ जाती हैमेरा सूरज ज़मीं रोज़ खा जाती हैमैं छुपा ही नहीं पाता ज़ख़्मों को अबमेरे होंठों पे अब टीस आ जाती है— Shivang Tiwari