कर के भरोसा धोखे खाता ही रहा
मैं फिर भी हर रिश्ता निभाता ही रहा
इल्ज़ाम क्या दूँ मैं रक़ीबों को यहाँ
हर दोस्त मेरा जब रुलाता ही रहा
जलते हैं सब रिश्ते हसद की आग में
ये आग मैं अहमक़ बुझाता ही रहा
सारे ही रिश्ते हो चले हैं मतलबी
रिश्ते निभा के दिल दुखाता ही रहा
कोई नहीं समझा मेरे जज़्बात-ए-दिल
बे-वज्ह रिश्तों को मनाता ही रहा
हर-सू यहाँ रिश्तों का माया-जाल है
मैं जाल में ख़ुद को फँसाता ही रहा
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