ख़ुदा तूने दिया सब कुछ मगर एहसान बाक़ी है
ज़माने में अलग अपनी अभी पहचान बाक़ी है
सजानी है अभी तो गीत, ग़ज़लों से भरी महफ़िल
सुख़न की दुनिया का बनना अभी सुलतान बाक़ी है
कई क़ाबिल खड़े हैं सामने दिल में लिए हसरत
मगर दो-चार होने को अभी मैदान बाक़ी है
मैं लोगों की ज़बाँ पर भी ठहर जाऊँ ग़ज़ल बनकर
गुज़रती ज़िन्दगी का बस यही अरमान बाक़ी है
अभी जुड़ना है बाक़ी रुक्न की कड़ियों को आपस में
अभी बनना ग़ज़ल की इक जुदा अरकान बाक़ी है
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