हिफ़ाज़त हो रही थी घर की सालों से
अहम रिश्ता था दरवाज़ों का तालों से
भला कैसे उतर आते फ़लक से वो
नहीं आए जो वापस अस्पतालों से
वो सारी रात गुज़री उस के सिरहाने
वो सारी रात गुज़रा मैं मलालों से
कभी छूनी हो गर यादें पुरानी तो
इजाज़त माँग लेना पहले जालों से
वो अपनी सादगी से मात खाया है
जिसे हर तख़्त मिल सकता था चालों से
— Sujata Mottha















