पैंतरा ये तिरा अब यार नहीं चल सकता
सिर्फ़ बातों से तो बाज़ार नहीं चल सकता
बस यही सोच के हर बार वो हदस गुज़रा
कि मिरे हाथ से हथियार नहीं चल सकता
पाँव अपने भी ज़रा आज़मा अंगारों पर
आग पर में ही तो हर बार नहीं चल सकता
ये अना तेरी ले डूबेगी तअल्लुक़ अपना
देख ऐसे कभी परिवार नहीं चल सकता
पलकों के पीछे हसीं ख़्वाब की इक दुनिया है
क्या मिरे साथ तू उस पार नहीं चल सकता
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Sujata Mottha
our suggestion based on Sujata Mottha
As you were reading Khuddari Shayari Shayari