sagā ab koi bhi meraa mire jitna nahin hota | सगा अब कोई भी मेरा मिरे जितना नहीं होता

  - Sujata Mottha

सगा अब कोई भी मेरा मिरे जितना नहीं होता
मैं कब का मर गया होता अगर लिखता नहीं होता

ज़ुबाँ को दायरे समझा दो जज़्बातों के अपने तुम
यक़ीनन कोई भी अपना यहाँ अपना नहीं होता

मैं ख़ुद को खोजता रहता हूँ छत से उन नज़ारों में
ज़मीं को घूरते हर शख़्स को मरना नहीं होता

बड़ी रहमत ये भी है महफ़िलों में यूँँ घिरा हूँ मैं
बड़ा ग़म ये भी है अब ख़ुद से ही मिलना नहीं होता

मिरी नींदों को यूँँ घेरे रहा इक ख़ौफ़ सालों तक
डरी दो आँखों में सुन्दर कोई सपना नहीं होता

  - Sujata Mottha

Dar Shayari

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