सगा अब कोई भी मेरा मिरे जितना नहीं होता
मैं कब का मर गया होता अगर लिखता नहीं होता
ज़ुबाँ को दायरे समझा दो जज़्बातों के अपने तुम
यक़ीनन कोई भी अपना यहाँ अपना नहीं होता
मैं ख़ुद को खोजता रहता हूँ छत से उन नज़ारों में
ज़मीं को घूरते हर शख़्स को मरना नहीं होता
बड़ी रहमत ये भी है महफ़िलों में यूँँ घिरा हूँ मैं
बड़ा ग़म ये भी है अब ख़ुद से ही मिलना नहीं होता
मिरी नींदों को यूँँ घेरे रहा इक ख़ौफ़ सालों तक
डरी दो आँखों में सुन्दर कोई सपना नहीं होता
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