मैं क्या करूँँ जो मौत से उम्मीद न रखूँ कोई
मैं क्या करूँँ कि ज़िन्दगी में कुछ बदल नहीं रहा
वो हौसला था फूँक मारकर बुझा दें आफ़ताब
ये हाल है कि मुझ सेे इक चराग़ जल नहीं रहा
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