Ahmad Farhad

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Ahmad Farhad shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Farhad's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तुझ सा है मेरी जान मगर तू तो नहीं है ये फूल तेरी कितनी कमी पूरी करेगा — Ahmad Farhad
किसे ख़बर थी दरख़्तों का ये कटाव कभी हमारे हल्क़ा-ए-अहबाब तक भी आएगा — Ahmad Farhad
बिछड़ने वाले में सौ ऐब थे मगर 'फ़रहाद' वो बद-दिमाग़ मेरा मसअला समझता था — Ahmad Farhad
बहुत मुद्दत के बा'द आई है बारिश और उस ज़ालिम के पेपर चल रहे हैं — Ahmad Farhad
मैं ठीक सोचता हूँ कोई हद मेरे लिए मैं साफ़ देखता हूँ मुझे मार दीजिए — Ahmad Farhad
जो ज़ख़्म बाँटते हैं उन्हें ज़ीस्त पे है हक़ मैं फूल बाँटता हूँ मुझे मार दीजिए — Ahmad Farhad
तू कौन है जो उस की कमी पूरी करेगा वो आएगा तो अपनी कमी पूरी करेगा — Ahmad Farhad
ये फ़ोकस पढ़ाई फ़्यूचर लगन और करियर की बातें मियाँ मसअला ये है तुम ने अभी उस को देखा नहीं है — Ahmad Farhad

Ghazal

उतरे हुए चेहरों तुम्हें आज़ादी मुबारक उजड़े हुए लोगों तुम्हें आज़ादी मुबारक सहमी हुई गलियों कोई मेला कोई नारा जकड़े हुए शहरों तुम्हें आज़ादी मुबारक ज़ंजीर की छन-छन पे कोई रक़्स-ओ-तमाशा नारों के ग़ुलामों तुम्हें आज़ादी मुबारक अब ख़ुश हो कि हर दिल में हैं नफ़रत के अलाव ऐ दीन फ़रोशों तुम्हें आज़ादी मुबारक बहती हुई आँखों ज़रा इज़हार-ए-मसर्रत रिसते हुए ज़ख़्मों तुम्हें आज़ादी मुबारक उखड़ी हुई नींदों मेरी छाती से लगो आज झुलसे हुए ख़्वाबों तुम्हें आज़ादी मुबारक टूटे हुए ख़्वाबों को खिलौने ही समझ लो रोते हुए बच्चों तुम्हें आज़ादी मुबारक फैले हुए हाथों इसी मंज़िल की तलब थी सिमटी हुई बाहों तुम्हें आज़ादी मुबारक हर ज़ुल्म पे ख़ामोशी की तसबीह में लग जाओ चलती हुई लाशों तुम्हें आज़ादी मुबारक मस्लक के ज़बानों के इलाक़ों के असीरों बिखरे हुए लोगों तुम्हें आज़ादी मुबारक — Ahmad Farhad
ख़ुश बिछड़ कर रह सका तू भी नहीं मैं भी नहीं हाँ मगर ये मानता तू भी नहीं मैं भी नहीं उम्र इक दूजे के पाँव काटने में काट कर आज पैरों पर खड़ा तू भी नहीं मैं भी नहीं एक दूजे को रुलाने का यही अंजाम था उम्र सारी फिर हँसा तू भी नहीं मैं भी नहीं दूसरों से माँगने क्या पारसाई के सुबूत सच तो ये है पारसा तू भी नहीं मैं भी नहीं अब तो मैं जिस इब्तिला में मुब्तला हूँ उस का हल ऐ मेरे मुश्किल-कुशा तू भी नहीं मैं भी नहीं कौन है फिर जिस ने खींची है जुदाई की लकीर मानता हूँ बे-वफ़ा तू भी नहीं मैं भी नहीं एक दुख ख़ामोश करता जा रहा है शहर को और इस पर बोलता तू भी नहीं मैं भी नहीं — Ahmad Farhad
काफ़िर हूँ सर-फिरा हूँ मुझे मार दीजिए मैं सोचने लगा हूँ मुझे मार दीजिए है एहतिराम-ए-हज़रत-ए-इंसान मेरा दीन बे-दीन हो गया हूँ मुझे मार दीजिए मैं पूछने लगा हूँ सबब अपने क़त्ल का मैं हद से बढ़ गया हूँ मुझे मार दीजिए करता हूँ अहल-ए-जुब्बा-ओ-दस्तार से सवाल गुस्ताख़ हो गया हूँ मुझे मार दीजिए ख़ुशबू से मेरा रब्त है जुगनू से मेरा काम कितना भटक गया हूँ मुझे मार दीजिए मा'लूम है मुझे कि बड़ा जुर्म है ये काम मैं ख़्वाब देखता हूँ मुझे मार दीजिए ज़ाहिद ये ज़ोहद-ओ-तक़्वा-ओ-परहेज़ की रविश मैं ख़ूब जानता हूँ मुझे मार दीजिए बे-दीन हूँ मगर हैं ज़माने में जितने दीन मैं सब को मानता हूँ मुझे मार दीजिए फिर उस के बा'द शहर में नाचेगा हूँ का शोर मैं आख़िरी सदा हूँ मुझे मार दीजिए मैं ठीक सोचता हूँ कोई हद मेरे लिए मैं साफ़ देखता हूँ मुझे मार दीजिए ये ज़ुल्म है कि ज़ुल्म को कहता हूँ साफ़ ज़ुल्म क्या ज़ुल्म कर रहा हूँ मुझे मार दीजिए ज़िंदा रहा तो करता रहूँगा हमेशा प्यार मैं साफ़ कह रहा हूँ मुझे मार दीजिए जो ज़ख़्म बाँटते हैं उन्हें ज़ीस्त पे है हक़ मैं फूल बाँटता हूँ मुझे मार दीजिए बारूद का नहीं मेरा मस्लक दरूद है मैं ख़ैर माँगता हूँ मुझे मार दीजिए — Ahmad Farhad

Nazm

"अगर तुम देख पाओ तो" अगर टाँगों के दो-शाख़े के बीचों-बीच लटके इस हवस-अंगेज़ पेंडुलम से उल्टे मुँह लटकने से ज़रा फ़ुर्सत मिले तो सोच लेना इस दो-शाख़े से ज़रा ऊपर को ऐसा चाक है जिस पर तुम्हारी बाँझ मिट्टी नौ महीने ख़ून पीकर शक्ल के कूज़े में उतरी थी अगर दिल छातियों को नोचने भंभोड़ने की ख़्वाहिशों के बार से थोड़ी ख़लासी ले तो बाईं सम्त थोड़ा ग़ौर करना तुम्हें इक दिल दिखाई देगा जिस में बस अज़ल से मर्द की झूठी मोहब्बत का हयूला रक़्स करता है अगर होंठों को दाँतों में चबाने काटने और मस्ख़ करने की हवा सर से निकल जाए तो इन होंठों के पन्नों पर लिखी तहरीर पढ़ना, तुम ख़ुदाओं का तकल्लुम भूल जाओगे अगर जूती पे रक्खे-रक्खे थक जाओ तो औरत को ज़रा पलकों पे रख कर देख लेना तुम्हें शुभ साअतों के ख़्वाब आएँगे अगर मर्दानगी का ख़ब्त शरियानों की नहरें छोड़ दे तो इन में कुछ इंसानियत का शहद भर देना तुम्हारे दिल की पथरीली ज़मीनों पर हया की फ़स्ल उतरेगी अगर वहशत का बादल आँख के पर्दे से छँट जाए तो थोड़ी देर सच्चाई की नीली धूप में एहसास की छत पर टहलना तुम्हें ललचाती रानों छातियों कूल्हों लबों और झूलती कमर की शहवत-गीर धुँद से पार इक तक़दीस में महका हुआ मौसम दिखाई देगा जिस का नाम औरत है अगर आँखों से ज़ेर-ए-नाफ़ रक्खे बुत हटा कर देख पाओ तो तुम्हें महसूस होगा ये कि औरत जिस्म से हट कर बहुत कुछ है अगर तुम देख पाओ तो — Ahmad Farhad