उतरे हुए चेहरों तुम्हें आज़ादी मुबारक

उजड़े हुए लोगों तुम्हें आज़ादी मुबारक

सहमी हुई गलियों कोई मेला कोई नारा
जकड़े हुए शहरों तुम्हें आज़ादी मुबारक

ज़ंजीर की छन-छन पे कोई रक़्स-ओ-तमाशा
नारों के ग़ुलामों तुम्हें आज़ादी मुबारक

अब ख़ुश हो कि हर दिल में हैं नफ़रत के अलाव
ऐ दीन फ़रोशों तुम्हें आज़ादी मुबारक

बहती हुई आँखों ज़रा इज़हार-ए-मसर्रत
रिसते हुए ज़ख़्मों तुम्हें आज़ादी मुबारक

उखड़ी हुई नींदों मेरी छाती से लगो आज
झुलसे हुए ख़्वाबों तुम्हें आज़ादी मुबारक

टूटे हुए ख़्वाबों को खिलौने ही समझ लो
रोते हुए बच्चों तुम्हें आज़ादी मुबारक

फैले हुए हाथों इसी मंज़िल की तलब थी
सिमटी हुई बाहों तुम्हें आज़ादी मुबारक

हर ज़ुल्म पे ख़ामोशी की तसबीह में लग जाओ
चलती हुई लाशों तुम्हें आज़ादी मुबारक

मस्लक के ज़बानों के इलाक़ों के असीरों
बिखरे हुए लोगों तुम्हें आज़ादी मुबारक

— Ahmad Farhad

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