ख़ुश बिछड़ कर रह सका तू भी नहीं मैं भी नहीं
हाँ मगर ये मानता तू भी नहीं मैं भी नहीं
'उम्र इक दूजे के पाँव काटने में काट कर
आज पैरों पर खड़ा तू भी नहीं मैं भी नहीं
एक दूजे को रुलाने का यही अंजाम था
'उम्र सारी फिर हँसा तू भी नहीं मैं भी नहीं
दूसरों से माँगने क्या पारसाई के सुबूत
सच तो ये है पारसा तू भी नहीं मैं भी नहीं
अब तो मैं जिस इब्तिला में मुब्तला हूँ उस का हल
ऐ मेरे मुश्किल-कुशा तू भी नहीं मैं भी नहीं
कौन है फिर जिस ने खींची है जुदाई की लकीर
मानता हूँ बेवफ़ा तू भी नहीं मैं भी नहीं
एक दुख ख़ामोश करता जा रहा है शहर को
और इस पर बोलता तू भी नहीं मैं भी नहीं
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