Bashar Nawaz

Bashar Nawaz

@bashar-nawaz

Bashar Nawaz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bashar Nawaz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो किस दर्द को कहते हैं वफ़ा तुम भी तो देखो — Bashar Nawaz
बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया मिरे दुख से किसी आवाज़ का रिश्ता निकल आया — Bashar Nawaz
दे निशानी कोई ऐसी कि सदा याद रहे ज़ख़्म की बात है क्या ज़ख़्म तो भर जाएँगे — Bashar Nawaz
कहते कहते कुछ बदल देता है क्यूँँ बातों का रुख़ क्यूँँ ख़ुद अपने आप के भी साथ वो सच्चा नहीं — Bashar Nawaz
तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं जलते लम्हे रफ़्ता रफ़्ता दिल को भी झुलसाएँगे — Bashar Nawaz
करोगे याद तो हर बात याद आएगी गुज़रते वक़्त की हर मौज ठहर जाएगी — Bashar Nawaz

Ghazal

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया मिरे दुख से किसी आवाज़ का रिश्ता निकल आया वो सर से पाँव तक जैसे सुलगती शाम का मंज़र ये किस जादू की बस्ती में दिल-ए-तन्हा निकल आया जिन आँखों की उदासी में बयाबाँ साँस लेते हैं उन्हीं की याद में नग़्मों का ये दरिया निकल आया सुलगते दिल के आँगन में हुई ख़्वाबों की फिर बारिश कहीं कोंपल महक उट्ठी कहीं पत्ता निकल आया पिघल उठता है इक इक लफ़्ज़ जिन होंटों की हिद्दत से मैं उन की आँच पी कर और भी सच्चा निकल आया गुमाँ था ज़िंदगी बे-सम्त ओ बे-मंज़िल बयाबाँ है मगर इक नाम पर फूलों-भरा रस्ता निकल आया — Bashar Nawaz
रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे तुम भी तंग आ जाओगे इक दिन हम भी उक्ता जाएँगे चढ़ता दरिया एक न इक दिन ख़ुद ही किनारे काटेगा अपने हँसते चेहरे कितने तूफ़ानों को छुपाएँगे आग पे चलते चलते अब तो ये एहसास भी खो बैठे क्या होगा ज़ख़्मों का मुदावा दामन कैसे बचाएँगे वो भी कोई हम ही सा मासूम गुनाहों का पुतला था नाहक़ उस से लड़ बैठे थे अब मिल जाए मनाएँगे इस जानिब हम उस जानिब तुम बीच में हाइल एक अलाव कब तक हम तुम अपने अपने ख़्वाबों को झुलसाएँगे सरमा की रुत काट के आने वाले परिंदों ये तो कहो दूर देस को जाने वाले कब तक लौट के आएँगे तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं जलते लम्हे रफ़्ता रफ़्ता दिल को भी झुलसाएँगे महफ़िल महफ़िल अपना तअल्लुक़ आज है इक मौज़ू-ए-सुख़न कल तक तर्क-ए-त'अल्लुक़ के भी अफ़्साने बन जाएँगे — Bashar Nawaz
चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो किस दर्द को कहते हैं वफ़ा तुम भी तो देखो महताब-ब-कफ़ रात किसे ढूँड रही है कुछ दूर चलो आओ ज़रा तुम भी तो देखो किस तरह किनारों को है सीने से लगाए ठहरे हुए पानी की अदा तुम भी तो देखो यादों के समन-ज़ार से आई हुई ख़ुश्बू दामन में छुपा लाई है क्या तुम भी तो देखो कुछ रात गए रोज़ जो आती है फ़ज़ा से हर दिल में है इक ज़ख़्म छुपा तुम भी तो देखो हर हँसते हुए फूल से रिश्ता है ख़िज़ाँ का हर दिल में है इक ज़ख़्म छुपा तुम भी तो देखो क्यूँँ आने लगीं साँस में गहराइयाँ सोचो क्यूँँ टूट चले बंद-ए-क़बा तुम भी तो देखो — Bashar Nawaz

Nazm