आज फिर इज़हार करते हैं सनम
आपसे ही प्यार करते हैं सनम
आपको क्या इश्क़ से परहेज़ है
आप क्यों इनकार करते हैं सनम
मैं ज़माने से अलग था और फिर कुछ यूँ हुआ
बात सुनकर भीड़ की, मैं भीड़ जैसा हो गया
दास्तान-ए-ज़िन्दगी के सिर्फ़ कुछ किरदार सच
झूठ है ज़ाती मकाँ और सब किराया-दार सच
ये ज़बाँ खुलती नहीं वैसे तो सबके सामने
पूछता है तो बता दूँगा तुझे दो-चार सच
झूठ कहना छोड़ दूँगा बस मुझे इतना बता
कौन अब तक कह सका हर एक को हर बार सच
जो ख़ुदा को चाहता है उसको जन्नत सच लगे
और काफ़िर को तो लगता है यही संसार सच
राज़ जो भी था नज़र में आ गया
आपका चेहरा नज़र में आ गया
वक़्त आया था बुरा सो देख लो
आपका लहजा नज़र में आ गया
डूबने वाली थी कश्ती इश्क़ की
और इक तिनका नज़र में आ गया
पाक था मैं और दामन था सफ़ेद
ख़ून का धब्बा नज़र में आ गया
काम भी सारा किया और चुप रहे
बोलने वाला नज़र में आ गया
कल पिताजी हँस रहे थे और तभी
पैर का छाला नज़र में आ गया