दास्तान-ए-ज़िन्दगी के सिर्फ़ कुछ किरदार सच
झूठ है ज़ाती मकाँ और सब किराया-दार सच
ये ज़बाँ खुलती नहीं वैसे तो सबके सामने
पूछता है तो बता दूँगा तुझे दो-चार सच
झूठ कहना छोड़ दूँगा बस मुझे इतना बता
कौन अब तक कह सका हर एक को हर बार सच
जो ख़ुदा को चाहता है उस को जन्नत सच लगे
और काफ़िर को तो लगता है यही संसार सच
— Divy Kamaldhwaj















