Irfan Sattar

Irfan Sattar

@irfan-sattar

Irfan Sattar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Irfan Sattar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ख़ुशबू था मैं बिखरना मेरा इख़्तिसास था इन ज़िम्मेदारियों ने इकट्ठा किया मुझे — Irfan Sattar
किसी आहट में आहट के सिवा कुछ भी नहीं अब किसी सूरत में सूरत के सिवा क्या रह गया है — Irfan Sattar
इक चुभन है कि जो बेचैन किए रहती है ऐसा लगता है कि कुछ टूट गया है मुझ में — Irfan Sattar
उस की ख़्वाहिश पे तुम को भरोसा भी है उस के होने न होने का झगड़ा भी है लुत्फ़ आया तुम्हें गुमरही ने कहा गुमरही के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल — Irfan Sattar
ये कैसे मलबे के नीचे दबा दिया गया हूँ मुझे बदन से निकालो मैं तंग आ गया हूँ — Irfan Sattar
नहीं नहीं मैं बहुत ख़ुश रहा हूँ तेरे बग़ैर यक़ीन कर कि ये हालत अभी अभी हुई है — Irfan Sattar
ये हम ही हैं कि किसी के अगर हुए तो हुए तुम्हारा क्या है कोई होगा कोई था कोई है — Irfan Sattar

Ghazal

यूँ ही बे-यक़ीं यूँ ही बे-निशाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई कहीं हो न जाऊँ मैं राएगाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई कभी साएबान न था बहम कभी कहकशाँ थी क़दम क़दम कभी बे-मकाँ कभी ला-मकाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई तेरे वस्ल की जो नवेद है वो क़रीब है कि बईद है मुझे कुछ ख़बर तो हो जान-ए-जाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई कोई ताना-ज़न मेरी ज़ात पर कोई ख़ंदा-ज़न किसी बात पर पय-ए-दिल-नवाज़ी-ए-दोस्ताँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई कभी ज़िक्र-ए-हुर्मत-ए-हर्फ़ में कभी फ़िक्र-ए-आमद-ओ-सर्फ़ में यूँ ही रिज़्क़-ओ-इश्क़ के दरमियाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई कभी मुझ को फ़िक्र-ए-मुआश है कभी आप अपनी तलाश है कोई गुर बताए मेरे नुक्ता-दाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई उसे पा लिया उसे खो दिया कभी हँस दिया कभी रो दिया बड़ी मुख़्तसर सी है दास्ताँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई तेरी हर दलील बहुत बजा मगर इंतिज़ार भी ता-कुजा ज़रा सोच तो मेरे राज़-दाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई कहाँ काएनात में घर करूँ मैं ये जान लूँ तो सफ़र करूँ इसी सोच में था कि ना-गहाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई — Irfan Sattar
यहाँ तकरार-ए-साअत के सिवा क्या रह गया है मुसलसल एक हालत के सिवा क्या रह गया है तुम्हें फ़ुर्सत हो दुनिया से तो हम से आ के मिलना हमारे पास फ़ुर्सत के सिवा क्या रह गया है बहुत मुमकिन है कुछ दिन में उसे हम तर्क कर दें तुम्हारा क़ुर्ब आदत के सिवा क्या रह गया है बहुत नादिम किया था हम ने इक शीरीं-सुख़न को सो अब ख़ुद पर नदामत के सिवा क्या रह गया है हमारा इश्क़ भी अब मांद है जैसे कि तुम हो तो ये सौदा रिआयत के सिवा क्या रह गया है कहाँ ले जाएँ ऐ दिल हम तिरी वुसअत-पसंदी कि अब दुनिया में वुसअत के सिवा क्या रह गया है सलामत है कोई ख़्वाहिश न कोई याद ज़िंदा बता ऐ शाम वहशत के सिवा क्या रह गया है किसी आहट में आहट के सिवा कुछ भी नहीं अब किसी सूरत में सूरत के सिवा क्या रह गया है बहुत लम्बा सफ़र तय हो चुका है ज़ेहन ओ दिल का तुम्हारा ग़म अलामत के सिवा क्या रह गया है अज़िय्यत थी मगर लज़्ज़त भी कुछ इस से सिवा थी अज़िय्यत है अज़िय्यत के सिवा क्या रह गया है हमारे दरमियाँ सारी ही बातें हो चुकी हैं सो अब इन की वज़ाहत के सिवा क्या रह गया है बजा कहते हो तुम होनी तो हो कर ही रहेगी तो होने को क़यामत के सिवा क्या रह गया है शुमार ओ बे-शुमारी के तरद्दुद से गुज़र कर मआल-ए-इश्क़-ए-वहदत के सिवा क्या रह गया है — Irfan Sattar
मुझे क्या ख़बर थी मुझे दूसरों ने बताया मैं कैसा हूँ क्या आदमी हूँ ये सब सुन के मुझ को भी लगने लगा है कि मैं वाक़ई इक बुरा आदमी हूँ किसी को सरोकार क्या मुझ में फैली हुई इस क़यामत की बेचारगी से अगर कोई मुझ सेे तअल्लुक़ भी रखता है तो यूँँ कि मैं काम का आदमी हूँ तुम्हें ये गिला है कि मैं वो नहीं जिस से तुम ने मोहब्बत के पैमा किए थे मुझे भी ये महसूस होने लगा है कि मैं वो नहीं दूसरा आदमी हूँ सभी हस्ब-ए-ख़्वाहिश ब-क़द्र-ए-ज़रूरत मुझे जानते हैं मुझे छानते हैं किसी को कहाँ इतनी फ़ुर्सत जो देखे कि मैं कितना टूटा हुआ आदमी हूँ मैं अपनी हक़ीक़त को संदूक़ में बंद कर के हर एक सुब्ह जाता हूँ दफ़्तर कभी शाम के बा'द देखो कि मैं कैसा पुर-हाल पुर-माजरा आदमी हूँ मैं सच बोलता हूँ कभी टोकता हूँ तो क्यूँँ आप ऐसे बुरा मानते हैं अज़ीज़ान-ए-मन आप समझे तो मुझ को कि मैं असल में आप का आदमी हूँ मैं इक़्लीम के और तक़्वीम के किस ग़लत रास्ते से यहाँ आ गया था मैं इस दौर में जी रहा हूँ तो बस ये समझ लो कि मैं मोजिज़ा आदमी हूँ अँधेरा तहय्युर ख़मोशी उदासी मुजर्रद हयूले जुनूँ बे-क़रारी ये तफ़सील सुन कर समझ तो गए हो कि मैं दिन नहीं रात का आदमी हूँ ये क्या ज़िंदगी है ये कैसा तमाशा है मैं इस तमाशे में क्या कर रहा हूँ मैं रोज़-ए-अज़ल से कुछ ऐसे सवालों की तकलीफ़ में मुब्तला आदमी हूँ मेरी बद-दिमाग़ी मुनाफ़िक़ रवय्यों से महफ़ूज़ रहने का है इक तरीक़ा मेरे पास आओ मेरे पास बैठो कि मैं तो सरापा दुआ आदमी हूँ मैं अपने तसव्वुर में तख़्लीक़ करता हूँ इक ऐसी दुनिया जो है मेरी दुनिया मेरी अपनी मर्ज़ी की एक ज़िंदगी है मैं तन्हाइयों में ख़ुदा आदमी हूँ मेरा क्या त'अर्रुफ़ मेरा नाम 'इरफ़ान' है और मेरी है इतनी कहानी मैं हर दौर का वाक़ि'आ आदमी हूँ मैं हर अहद का सानिहा आदमी हूँ — Irfan Sattar
कोई मिला तो किसी और की कमी हुई है सो दिल ने बे-तलबी इख़्तियार की हुई है जहाँ से दिल की तरफ़ ज़िंदगी उतरती थी निगाह अब भी उसी बाम पर जमी हुई है है इंतिज़ार उसे भी तुम्हारी ख़ुश-बू का हवा गली में बहुत देर से रुकी हुई है तुम आ गए हो तो अब आईना भी देखेंगे अभी अभी तो निगाहों में रौशनी हुई है हमारा इल्म तो मरहून-ए-लौह-ए-दिल है मियाँ किताब-ए-अक़्ल तो बस ताक़ पर धरी हुई है बनाओ साए हरारत बदन में जज़्ब करो कि धूप सेहन में कब से यूँँही पड़ी हुई है नहीं नहीं मैं बहुत ख़ुश रहा हूँ तेरे बग़ैर यक़ीन कर कि ये हालत अभी अभी हुई है वो गुफ़्तुगू जो मिरी सिर्फ़ अपने-आप से थी तिरी निगाह को पहुँची तो शा'इरी हुई है — Irfan Sattar
इक ख़्वाब नींद का था सबब जो नहीं रहा उस का क़लक़ है ऐसा कि मैं सो नहीं रहा वो हो रहा है जो मैं नहीं चाहता कि हो और जो मैं चाहता हूँ वही हो नहीं रहा नम दीदा हूँ कि तेरी ख़ुशी पर हूँ ख़ुश बहुत चल छोड़ तुझ से कह जो दिया रो नहीं रहा ये ज़ख़्म जिस को वक़्त का मरहम भी कुछ नहीं ये दाग़ सैल-ए-गिर्या जिसे धो नहीं रहा अब भी है रंज रंज भी ख़ासा शदीद है वो दिल को चीरता हुआ ग़म गो नहीं रहा आबाद मुझ में तेरे सिवा और कौन है तुझ से बिछड़ रहा हूँ तुझे खो नहीं रहा क्या बे-हिसी का दौर है लोगों कि अब ख़याल अपने सिवा किसी का किसी को नहीं रहा — Irfan Sattar
कोई नग़्मा बुनूँ चाँदनी ने कहा चाँदनी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल कोई ताज़ा ग़ज़ल फिर किसी ने कहा फिर किसी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल ज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त को पलकों से सीते हुए साँस लेने की आदत में जीते हुए अब भी ज़िंदा हो तुम ज़िंदगी ने कहा ज़िंदगी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल उस की ख़्वाहिश पे तुम को भरोसा भी है उस के होने न होने का झगड़ा भी है लुत्फ़ आया तुम्हें गुमरही ने कहा गुमरही के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल ऐसी दुनिया में कब तक गुज़ारा करें तुम ही कह दो कि कैसे गवारा करें रात मुझ से मिरी बेबसी ने कहा बेबसी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल मंज़रों से बहलना ज़रूरी नहीं घर से बाहर निकलना ज़रूरी नहीं दिल को रौशन करो रौशनी ने कहा रौशनी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल मैं इबादत भी हूँ मैं मोहब्बत भी हूँ ज़िंदगी की नुमू की अलामत भी हूँ मेरी पलकों पे ठहरी नमी ने कहा इस नमी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल आरज़ूओं की माला पिरोने से हैं ये ज़मीं आसमाँ मेरे होने से हैं मुझ पे भी कुछ कहो आदमी ने कहा आदमी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल अपनी तन्हाई में रात मैं था मगन एक आहट हुई ध्यान में दफ़्अ'तन मुझ से बातें करो ख़ामुशी ने कहा ख़ामुशी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल जब रिफ़ाक़त का सामाँ बहम कर लिया मैं ने आख़िर उसे हम-क़दम कर लिया अब मिरे दुख सहो हम-रही ने कहा हम-रही के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल — Irfan Sattar
अपनी ख़बर न उस का पता है ये इश्क़ है जो था नहीं है और न था है ये इश्क़ है पहले जो था वो सिर्फ़ तुम्हारी तलाश थी लेकिन जो तुम से मिल के हुआ है ये इश्क़ है तश्कीक है न जंग है माबैन-ए-अक़्ल-ओ-दिल बस ये यक़ीन है कि ख़ुदा है ये इश्क़ है बेहद ख़ुशी है और है बे-इंतिहा सुकून अब दर्द है न ग़म न गिला है ये इश्क़ है क्या रम्ज़ जाननी है तुझे अस्ल-ए-इश्क़ की जो तुझ में उस बदन के सिवा है ये इश्क़ है शोहरत से तेरी ख़ुश जो बहुत है ये है ख़िरद और ये जो तुझ में तुझ से ख़फ़ा है ये इश्क़ है ज़ेर-ए-क़बा जो हुस्न है वो हुस्न है ख़ुदा बंद-ए-क़बा जो खोल रहा है ये इश्क़ है इदराक की कमी है समझना इसे मरज़ इस की दुआ न इस की दवा है ये इश्क़ है शफ़्फ़ाफ़-ओ-साफ़ और लताफ़त में बे-मिसाल सारा वजूद आईना सा है ये इश्क़ है या'नी कि कुछ भी इस के सिवा सूझता नहीं हाँ तो जनाब मसअला क्या है ये इश्क़ है जो अक़्ल से बदन को मिली थी वो थी हवस जो रूह को जुनूँ से मिला है ये इश्क़ है इस में नहीं है दख़्ल कोई ख़ौफ़ ओ हिर्स का इस की जज़ा न इस की सज़ा है ये इश्क़ है सज्दे में है जो महव-ए-दुआ वो है बे-दिली ये जो धमाल डाल रहा है ये इश्क़ है होता अगर कुछ और तो होता अना-परस्त उस की रज़ा शिकस्त-ए-अना है ये इश्क़ है 'इरफ़ान' मानने में तअम्मुल तुझे ही था मैं ने तो ये हमेशा कहा है ये इश्क़ है — Irfan Sattar