ik KHvaab neend ka tha sabab jo nahin rahaus ka qalq hai aisa ki main so nahin raha | इक ख़्वाब नींद का था सबब जो नहीं रहा

  - Irfan Sattar

इक ख़्वाब नींद का था सबब जो नहीं रहा
उस का क़लक़ है ऐसा कि मैं सो नहीं रहा

वो हो रहा है जो मैं नहीं चाहता कि हो
और जो मैं चाहता हूँ वही हो नहीं रहा

नम दीदा हूँ कि तेरी ख़ुशी पर हूँ ख़ुश बहुत
चल छोड़ तुझ से कह जो दिया रो नहीं रहा

ये ज़ख़्म जिस को वक़्त का मरहम भी कुछ नहीं
ये दाग़ सैल-ए-गिर्या जिसे धो नहीं रहा

अब भी है रंज रंज भी ख़ासा शदीद है
वो दिल को चीरता हुआ ग़म गो नहीं रहा

आबाद मुझ में तेरे सिवा और कौन है
तुझ से बिछड़ रहा हूँ तुझे खो नहीं रहा

क्या बे-हिसी का दौर है लोगों कि अब ख़याल
अपने सिवा किसी का किसी को नहीं रहा

  - Irfan Sattar

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