Khursheed Rizvi

Khursheed Rizvi

@khursheed-rizvi

Khursheed Rizvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Khursheed Rizvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जिन लोगों में रहता हूँ मैं उन में से नहीं हूँ हूँ कौन मुझे अपना ज़माना नहीं मिलता — Khursheed Rizvi
कभी अपनी आँख से ज़िंदगी पे नज़र न की वही ज़ाविए कि जो आम थे मुझे खा गए — Khursheed Rizvi
जब कभी ख़ुद को ये समझाऊँ कि तू मेरा नहीं मुझ में कोई चीख़ उठता है नहीं ऐसा नहीं — Khursheed Rizvi
आख़िर को हँस पड़ेंगे किसी एक बात पर रोना तमाम उम्र का बे-कार जाएगा — Khursheed Rizvi
आसाँ तो नहीं अपनी हस्ती से गुज़र जाना उतरा जो समुंदर में दरिया तो बहुत रोया — Khursheed Rizvi
तमाम उम्र अकेले में तुझ से बातें कीं तमाम उम्र तेरे रू-ब-रू ख़मोश रहे — Khursheed Rizvi
कब निकलता है कोई दिल में उतर जाने के बा'द इस गली की दूसरी जानिब कोई रस्ता नहीं — Khursheed Rizvi
तू मुझे बनते बिगड़ते हुए अब ग़ौर से देख वक़्त कल चाक पे रहने दे न रहने दे मुझे — Khursheed Rizvi

Ghazal

ये जो नंग थे ये जो नाम थे मुझे खा गए ये ख़याल-ए-पुख़्ता जो ख़ाम थे मुझे खा गए कभी अपनी आँख से ज़िंदगी पे नज़र न की वही ज़ाविए कि जो आम थे मुझे खा गए मैं अमीक़ था कि पला हुआ था सुकूत में ये जो लोग महव-ए-कलाम थे मुझे खा गए वो जो मुझ में एक इकाई थी वो न जुड़ सकी यही रेज़ा रेज़ा जो काम थे मुझे खा गए ये अयाँ जो आब-ए-हयात है इसे क्या करूँँ कि निहाँ जो ज़हर के जाम थे मुझे खा गए वो नगीं जो ख़ातिम-ए-ज़िंदगी से फिसल गया तो वही जो मेरे ग़ुलाम थे मुझे खा गए मैं वो शो'ला था जिसे दाम से तो ज़रर न था प जो वसवसे तह-ए-दाम थे मुझे खा गए जो खुली खुली थीं अदावतें मुझे रास थीं ये जो ज़हर-ए-ख़ंदा-सलाम थे मुझे खा गए — Khursheed Rizvi
कहाँ हूँ मैं कि मेरा कोई आश्ना भी नहीं किसी का ज़िक्र तो क्या घर में आइना भी नहीं रहे ख़मोश तो टूटा न रिश्ता-ए-उम्मीद पुकारते तो ख़राबों में कोई था भी नहीं तेरी सदा पे तो सदियाँ भी लौट आती हैं मुझे बला में कुछ ऐसा शिकस्ता-पा भी नहीं ये और बात कि नक़्श-ए-क़दम दिखाई न दें मगर वो अर्सा-ए-दिल से अभी गया भी नहीं उस ए'तिराफ़ से रस घुल रहा है कानों में वो ए'तिराफ़ जो उस ने अभी किया भी नहीं जिस एक चीज़ से तेरा फ़िराक़ आसाँ है वो एक चीज़ तेरी याद के सिवा भी नहीं मेरा भरम हैं तग़ाफ़ुल-शिआ'रियाँ तेरी तू पूछ ले तो मिरा कोई मुद्दआ' भी नहीं मुसालहत भी नहीं है सरिश्त में अपनी मगर किसी से तसादुम का हौसला भी नहीं न जाने कब न रहें हम हमें ग़नीमत जान हयात-ओ-मौत में कुछ ऐसा फ़ासला भी नहीं मआल-ए-कार-ए-क़नाअत है सो अभी से सही वगर्ना तूल-ए-तमन्ना की इंतिहा भी नहीं — Khursheed Rizvi
जो हमारी नहीं थी सर वो मुसीबत नहीं ली शहर तैयार था पर हम ने ही बै'अत नहीं ली जो मुयस्सर था लुटाते रहे सरशारी में अहल-ए-दुनिया से किसी चीज़ की क़ीमत नहीं ली हम ने जो कुछ भी किया उम्र-ए-दो-रोज़ा में किया अबदियत के लिए मर्ग से मोहलत नहीं ली यक-ब-यक टूट गया चारा-गरी से पहले दिल-ए-बीमार ने हम से कोई ख़िदमत नहीं ली कुछ अगर लें तो सिला उस का चुकाए कैसे इसी मुश्किल में रहे कोई सहूलत नहीं ली चाहने वालों ने मेरे मुझे चाहा तो बहुत पर किसी ने मेरी मीरास-ए-तबीअत नहीं ली इक निगाह-ए-ग़लत-अंदाज़ भी दुनिया पे न की रश्क तो दूर बहुत दूर है इबरत नहीं ली बे-सबब मश्क़-ए-सुख़न से है ख़मोशी अच्छी हर्फ़ बातिल है अगर दिल से इजाज़त नहीं ली — Khursheed Rizvi
जब कभी ख़ुद को ये समझाऊँ कि तू मेरा नहीं मुझ में कोई चीख़ उठता है नहीं ऐसा नहीं वारदात-ए-दिल का क़िस्सा है ग़म-ए-दुनिया नहीं शे'र तेरी आरसी है मेरा आईना नहीं कब निकलता है कोई दिल में उतर जाने के बा'द इस गली की दूसरी जानिब कोई रस्ता नहीं तुम समझते हो बिछड़ जाने से मिट जाता है इश्क़ तुम को इस दरिया की गहराई का अंदाज़ा नहीं उन से मिल कर भी कहाँ मिटता है दिल का इज़्तिराब इश्क़ की दीवार के दोनों तरफ़ साया नहीं कब तेरी बू-ए-वफ़ा से बे-वफ़ाई दिल ने की कब मुझे बाद-ए-शबा ने ख़ून रुलवाया नहीं मत समझ मेरे तबस्सुम को मसर्रत की दलील जो मेरे दिल तक उतरता हो ये वो ज़ीना नहीं यूँँ तराशूँगा ग़ज़ल में तेरे पैकर के नुक़ूश वो भी देखेगा तुझे जिस ने तुझे देखा नहीं सब्त है इस बाम-ओ-दर पर तेरी आवाज़ों के नक़्श मैं ख़ुदा-ना-कर्दा पत्थर पूजने वाला नहीं ख़ामुशी काग़ज़ के पैराहन में लिपटी ख़ामुशी अर्ज़-ए-ग़म का इस से बेहतर कोई पैराया नहीं कब तलक पत्थर की दीवारों में दस्तक दीजिए तेरे सीने में तो शायद कोई दरवाज़ा नहीं — Khursheed Rizvi