जब कभी ख़ुद को ये समझाऊँ कि तू मेरा नहीं
मुझ में कोई चीख़ उठता है नहीं ऐसा नहीं
वारदात-ए-दिल का क़िस्सा है ग़म-ए-दुनिया नहीं
शे'र तेरी आरसी है मेरा आईना नहीं
कब निकलता है कोई दिल में उतर जाने के बाद
इस गली की दूसरी जानिब कोई रस्ता नहीं
तुम समझते हो बिछड़ जाने से मिट जाता है ''इश्क़
तुम को इस दरिया की गहराई का अंदाज़ा नहीं
उन से मिल कर भी कहाँ मिटता है दिल का इज़्तिराब
'इश्क़ की दीवार के दोनों तरफ़ साया नहीं
कब तेरी बू-ए-वफ़ा से बे-वफ़ाई दिल ने की
कब मुझे बाद-ए-शबा ने ख़ून रुलवाया नहीं
मत समझ मेरे तबस्सुम को मसर्रत की दलील
जो मेरे दिल तक उतरता हो ये वो ज़ीना नहीं
यूँँ तराशूँगा ग़ज़ल में तेरे पैकर के नुक़ूश
वो भी देखेगा तुझे जिसने तुझे देखा नहीं
सब्त है इस बाम ओ डर पर तेरी आवाज़ों के नक़्श
मैं ख़ुदा-ना-कर्दा पत्थर पूजने वाला नहीं
ख़ामुशी काग़ज़ के पैराहन में लिपटी ख़ामुशी
अर्ज़-ए-ग़म का इस से बेहतर कोई पैराया नहीं
कब तलक पत्थर की दीवारों में दस्तक दीजिए
तेरे सीने में तो शायद कोई दरवाज़ा नहीं
As you were reading Shayari by Khursheed Rizvi
our suggestion based on Khursheed Rizvi
As you were reading undefined Shayari