जो हमारी नहीं थी सर वो मुसीबत नहीं ली

शहर तैयार था पर हम ने ही बै'अत नहीं ली

जो मुयस्सर था लुटाते रहे सरशारी में
अहल-ए-दुनिया से किसी चीज़ की क़ीमत नहीं ली

हम ने जो कुछ भी किया उम्र-ए-दो-रोज़ा में किया
अबदियत के लिए मर्ग से मोहलत नहीं ली

यक-ब-यक टूट गया चारा-गरी से पहले
दिल-ए-बीमार ने हम से कोई ख़िदमत नहीं ली

कुछ अगर लें तो सिला उस का चुकाए कैसे
इसी मुश्किल में रहे कोई सहूलत नहीं ली

चाहने वालों ने मेरे मुझे चाहा तो बहुत
पर किसी ने मेरी मीरास-ए-तबीअत नहीं ली

इक निगाह-ए-ग़लत-अंदाज़ भी दुनिया पे न की
रश्क तो दूर बहुत दूर है इबरत नहीं ली

बे-सबब मश्क़-ए-सुख़न से है ख़मोशी अच्छी
हर्फ़ बातिल है अगर दिल से इजाज़त नहीं ली

— Khursheed Rizvi

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