दे दिए है दाग अब तो रंग जमना चाहिए
बस तिरे इस हाथ में ख़ंजर न दिखना चाहिए
लग गए है घाव जितने रख दिए है खोल कर
हो न हो इस रंज का अंजाम होना चाहिए
दिल मिरा ये थम गया है हिज़्र की इक बात पर
कह रही है वो कि मुझको आम लगना चाहिए
है नहीं कोई गिला अब है नहीं कोई दुखन
इन लबो की मुस्कुराहट को दवा बनना चाहिए
थे अकल के काम करने को जमाने में 'निकुंज'
हम वही करते रहे जो दिल समझना चाहिए
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