Rajinder Manchanda Bani

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Rajinder Manchanda Bani shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rajinder Manchanda Bani's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

फिर न गुंजाइश-ए-यक-सदमा भी हम तुम में रही टूटता सिलसिला दोनों पे अयाँ था कितना — Rajinder Manchanda Bani
ऐ सफ़-ए-अब्र-ए-रवाँ तेरे बा'द इक घना साया शजर से निकला — Rajinder Manchanda Bani
मैं हूँ और वादा-ए-फ़र्दा तेरा और इक उम्र पड़ी हो जैसे — Rajinder Manchanda Bani
वो टूटते हुए रिश्तों का हुस्न-ए-आख़िर था कि चुप सी लग गई दोनों को बात करते हुए — Rajinder Manchanda Bani
अजीब लम्हा-ए-कमज़ोर से मैं गुज़रा हूँ तमाम सिलसिला पल में बिखरने वाला था — Rajinder Manchanda Bani
वो एक अक्स कि पल भर नज़र में ठहरा था तमाम उम्र का अब सिलसिला है मेरे लिए — Rajinder Manchanda Bani
कोई खड़ा है मेरी तरह भीड़ में तन्हा नज़र बचा के मेरी सम्त देखता है बहुत — Rajinder Manchanda Bani
ज़रा छुआ था कि बस पेड़ आ गिरा मुझ पर कहाँ ख़बर थी कि अंदर से खोखला है बहुत — Rajinder Manchanda Bani
लो सारे शहर के पत्थर समेट लाए हैं हम कहाँ है हम को शब-ओ-रोज़ तौलने वाला — Rajinder Manchanda Bani
जो मेरे वास्ते कल ज़हर बन के निकलेगा तिरे लबों पे सँभलता हुआ सा कुछ तो है — Rajinder Manchanda Bani
तू कोई ग़म है तो दिल में जगह बना अपनी तू इक सदा है तो एहसास की कमाँ से निकल — Rajinder Manchanda Bani

Ghazal

बजाए हम-सफ़री इतना राब्ता है बहुत कि मेरे हक़ में तेरी बे-ज़रर दुआ है बहुत थी पाँव में कोई ज़ंजीर बच गए वर्ना रम-ए-हवा का तमाशा यहाँ रहा है बहुत ये मोड़ काट के मंज़िल का अक्स देखोगे इसी जगह मगर इम्कान-ए-हादसा है बहुत बस एक चीख़ ही यूँ तो हमें अदा कर दे मुआमला हुनर-ए-हर्फ़ का जुदा है बहुत मेरी ख़ुशी का वो क्या क्या ख़याल रखता है कि जैसे मेरी तबीअत से आश्ना है बहुत तमाम उम्र जिन्हें हम ने टूट कर चाहा हमारे हाथों उन्हीं पर सितम हुआ है बहुत ज़रा छुआ था कि बस पेड़ आ गिरा मुझ पर कहाँ ख़बर थी कि अंदर से खोखला है बहुत कोई खड़ा है मिरी तरह भीड़ में तन्हा नज़र बचा के मेरी सम्त देखता है बहुत ये एहतियात-कदा है कड़े उसूलों का ज़रा से नक़्स पे 'बानी' यहाँ सज़ा है बहुत — Rajinder Manchanda Bani
जो ज़हर है मेरे अंदर वो देखना चाहूँ अजब नहीं मैं तेरा भी कभी बुरा चाहूँ मैं अपने पीछे अजब गर्द छोड़ आया हूँ मुझे भी रह न मिलेगी जो लौटना चाहूँ वो इक इशारा-ए-ज़ेरीं हज़ार ख़ूब सही मैं अब सदा के सिले में कोई सदा चाहूँ मेरे हुरूफ़ के आईने में न देख मुझे मैं अपनी बात का मफ़्हूम दूसरा चाहूँ खुली है दिल पे कुछ इस तरह ग़म की बे-सबबी तेरी ख़बर न कुछ अपना ही अब पता चाहूँ कोई पहाड़ न दरिया न आग रस्ते में अजब सपाट सफ़र है कि हादसा चाहूँ न चाहूँ दूर से आती हुई कोई आवाज़ न अपने साथ में अपनी सदा-ए-पा चाहूँ न चाहूँ सामने अपने कोई अक्स-ए-सफ़र न सर पे राह दिखाती हुई हवा चाहूँ वो लाए तो किसी रंजिश को दरमियाँ 'बानी' मैं बात करने को थोड़ा सा फ़ासला चाहूँ — Rajinder Manchanda Bani
मुझे पता था कि ये हादसा भी होना था मैं उस से मिल के न था ख़ुश जुदा भी होना था चलो कि जज़्बा-ए-इज़हार चीख़ में तो ढला किसी तरह इसे आख़िर अदा भी होना था बना रही थी अजब चित्र डूबती हुई शाम लहू कहीं कहीं शामिल मिरा भी होना था अजब सफ़र था कि हम रास्तों से कटते गए फिर इस के बा'द हमें लापता भी होना था मैं तेरे पास चला आया ले के शिकवे-गिले कहाँ ख़बर थी कोई फ़ैसला भी होना था ग़ुबार बन के उड़े तेज़-रौ कि उन के लिए तो क्या ज़रूर कोई रास्ता भी होना था सराए पर था धुआँ जम' सारी बस्ती का कुछ इस तरह कि कोई सानिहा भी होना था मुझे ज़रा सा गुमाँ भी न था अकेला हूँ कि दुश्मनों का कहीं सामना भी होना था — Rajinder Manchanda Bani
दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला मैं कि अक्स-ए-मुंतशिर एक एक मंज़र में अकेला उड़ चला वो इक जुदा ख़ाका लिए सर में अकेला सुब्ह का पहला परिंदा आसमाँ भर में अकेला कौन दे आवाज़ ख़ाली रात के अंधे कुएँ में कौन उतरे ख़्वाब से महरूम बिस्तर में अकेला उस को तन्हा कर गई करवट कोई पिछले पहर की फिर उड़ा भागा वो सारा दिन नगर भर में अकेला एक मद्धम आँच सी आवाज़ सरगम से अलग कुछ रंग इक दबता हुआ सा पूरे मंज़र में अकेला बोलती तस्वीर में इक नक़्श लेकिन कुछ हटा सा एक हर्फ़-ए-मो'तबर लफ़्ज़ों के लश्कर में अकेला जाओ मौजो मेरी मंज़िल का पता क्या पूछती हो इक जज़ीरा दूर उफ़्तादा समुंदर में अकेला जाने किस एहसास ने आगे नहीं बढ़ने दिया था अब पड़ा हूँ क़ैद मैं रस्ते के पत्थर में अकेला हू-ब-हू मेरी तरह चुप-चाप मुझ को देखता है इक लरज़ता ख़ूब-सूरत अक्स साग़र में अकेला — Rajinder Manchanda Bani
मैं उस की बात की तरदीद करने वाला था इक और हादसा मुझ पर गुज़रने वाला था कहीं से आ गया इक अब्र दरमियाँ वर्ना मेरे बदन में ये सूरज उतरने वाला था मुझे सँभाल लिया तेरी एक आहट ने सुकूत-ए-शब की तरह मैं बिखरने वाला था अजीब लम्हा-ए-कमज़ोर से मैं गुज़रा हूँ तमाम सिलसिला पल में बिखरने वाला था मैं लड़खड़ा सा गया साया-ए-शजर में ज़रूर मैं रास्ते में मगर कब ठहरने वाला था अब आसमाँ भी बड़ा शांत है ज़मीं भी सुखी गुज़र गया है जो हम पर गुज़रने वाला था लगा जो पीठ में आ कर वो तीर था किस का मैं दुश्मनों की सफ़ों में न मरने वाला था — Rajinder Manchanda Bani
दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला मैं कि अक्स-ए-मुंतशिर एक एक मंज़र में अकेला उड़ चला वो इक जुदा ख़ाका लिए सर में अकेला सुब्ह का पहला परिंदा आसमाँ भर में अकेला कौन दे आवाज़ ख़ाली रात के अंधे कुएँ में कौन उतरे ख़्वाब से महरूम बिस्तर में अकेला उस को तन्हा कर गई करवट कोई पिछले पहर की फिर उड़ा भागा वो सारा दिन नगर भर में अकेला एक मद्धम आँच सी आवाज़ सरगम से अलग कुछ रंग इक दबता हुआ सा पूरे मंज़र में अकेला बोलती तस्वीर में इक नक़्श लेकिन कुछ हटा सा एक हर्फ़-ए-मो'तबर लफ़्ज़ों के लश्कर में अकेला जाओ मौजो मेरी मंज़िल का पता क्या पूछती हो इक जज़ीरा दूर उफ़्तादा समुंदर में अकेला जाने किस एहसास ने आगे नहीं बढ़ने दिया था अब पड़ा हूँ क़ैद मैं रस्ते के पत्थर में अकेला हू-ब-हू मेरी तरह चुप-चाप मुझ को देखता है इक लरज़ता ख़ूब-सूरत अक्स साग़र में अकेला — Rajinder Manchanda Bani
न मंज़िलें थीं न कुछ दिल में था न सर में था अजब नज़ारा-ए-ला-सम्तियत नज़र में था इताब था किसी लम्हे का इक ज़माने पर किसी को चैन न बाहर था और न घर में था छुपा के ले गया दुनिया से अपने दिल के घाव कि एक शख़्स बहुत ताक़ इस हुनर में था किसी के लौटने की जब सदा सुनी तो खुला कि मेरे साथ कोई और भी सफ़र में था कभी मैं आब के तामीर-कर्दा क़स्र में हूँ कभी हवा में बनाए हुए से घर में था झिजक रहा था वो कहने से कोई बात ऐसी मैं चुप खड़ा था कि सब कुछ मेरी नज़र में था यही समझ के उसे ख़ुद सदा न दी मैं ने वो तेज़-गाम किसी दूर के सफ़र में था कभी हूँ तेरी ख़मोशी के कटते साहिल पर कभी मैं लौटती आवाज़ के भँवर में था हमारी आँख में आ कर बना इक अश्क वो रंग जो बर्ग-ए-सब्ज़ के अंदर न शाख़-ए-तर में था कोई भी घर में समझता न था मेरे दुख सुख एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था अभी न बरसे थे 'बानी' घिरे हुए बादल मैं उड़ती ख़ाक की मानिंद रहगुज़र में था — Rajinder Manchanda Bani
क़दम ज़मीं पे न थे राह हम बदलते क्या हवा बँधी थी यहाँ पीठ पर सँभलते क्या फिर उस के हाथों हमें अपना क़त्ल भी था क़ुबूल कि आ चुके थे क़रीब इतने बच निकलते क्या यही समझ के वहाँ से मैं हो लिया रुख़्सत वो चलते साथ मगर दूर तक तो चलते क्या तमाम शहर था इक मोम का 'अजाइब घर चढ़ा जो दिन तो ये मंज़र न फिर पिघलते क्या वो आसमाँ थे कि आँखें समेटती कैसे वो ख़्वाब थे कि मेरी ज़िंदगी में ढलते क्या निबाहने की उसे भी थी आरज़ू तो बहुत हवा ही तेज़ थी इतनी चराग़ जलते क्या उठे और उठ के उसे जा सुनाया दुख अपना कि सारी रात पड़े करवटें बदलते क्या न आबरू-ए-त'अल्लुक़ ही जब रही 'बानी' बग़ैर बात किए हम वहाँ से टलते क्या — Rajinder Manchanda Bani
मेरे बदन में पिघलता हुआ सा कुछ तो है इक और ज़ात में ढलता हुआ सा कुछ तो है मेरी सदा न सही हाँ मेरा लहू न सही ये मौज मौज उछलता हुआ सा कुछ तो है कहीं न आख़िरी झोंका हो मिटते रिश्तों का ये दरमियाँ से निकलता हुआ सा कुछ तो है नहीं है आँख के सहरा में एक बूँद सराब मगर ये रंग बदलता हुआ सा कुछ तो है जो मेरे वास्ते कल ज़हर बन के निकलेगा तेरे लबों पे सँभलता हुआ सा कुछ तो है ये अक्स पैकर-ए-सद-लम्स है नहीं न सही किसी ख़याल में ढलता हुआ सा कुछ तो है बदन को तोड़ के बाहर निकलना चाहता है ये कुछ तो है ये मचलता हुआ सा कुछ तो है किसी के वास्ते होगा पयाम या कोई क़हर हमारे सर से ये टलता हुआ सा कुछ तो है ये मैं नहीं न सही अपने सर्द बिस्तर पर ये करवटें सी बदलता हुआ सा कुछ तो है वो कुछ तो था मैं सहारा जिसे समझता था ये मेरे साथ फिसलता हुआ सा कुछ तो है बिखर रहा है फ़ज़ा में ये दूद रौशनी का उधर पहाड़ के जलता हुआ सा कुछ तो है मेरे वुजूद से जो कट रहा है गाम-ब-गाम ये अपनी राह बदलता हुआ सा कुछ तो है जो चाटता चला जाता है मुझ को ऐ 'बानी' ये आस्तीन में पलता हुआ सा कुछ तो है — Rajinder Manchanda Bani