फिर न गुंजाइश-ए-यक-सदमा भी हम तुम में रही
टूटता सिलसिला दोनों पे अयाँ था कितना
टूटता सिलसिला दोनों पे अयाँ था कितना
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थी पाँव में कोई ज़ंजीर बच गए वर्ना
रम-ए-हवा का तमाशा यहाँ रहा है बहुत
ये मोड़ काट के मंज़िल का अक्स देखोगे
इसी जगह मगर इम्कान-ए-हादसा है बहुत
बस एक चीख़ ही यूँ तो हमें अदा कर दे
मुआमला हुनर-ए-हर्फ़ का जुदा है बहुत
मेरी ख़ुशी का वो क्या क्या ख़याल रखता है
कि जैसे मेरी तबीअत से आश्ना है बहुत
तमाम उम्र जिन्हें हम ने टूट कर चाहा
हमारे हाथों उन्हीं पर सितम हुआ है बहुत
ज़रा छुआ था कि बस पेड़ आ गिरा मुझ पर
कहाँ ख़बर थी कि अंदर से खोखला है बहुत
कोई खड़ा है मिरी तरह भीड़ में तन्हा
नज़र बचा के मेरी सम्त देखता है बहुत
ये एहतियात-कदा है कड़े उसूलों का
ज़रा से नक़्स पे 'बानी' यहाँ सज़ा है बहुत
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मैं हूँ और वादा-ए-फ़र्दा तेरा
और इक उम्र पड़ी हो जैसे
और इक उम्र पड़ी हो जैसे
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मेरे बदन में पिघलता हुआ सा कुछ तो है
इक और ज़ात में ढलता हुआ सा कुछ तो है
इक और ज़ात में ढलता हुआ सा कुछ तो है
मेरी सदा न सही हाँ मेरा लहू न सही
ये मौज मौज उछलता हुआ सा कुछ तो है
कहीं न आख़िरी झोंका हो मिटते रिश्तों का
ये दरमियाँ से निकलता हुआ सा कुछ तो है
नहीं है आँख के सहरा में एक बूँद सराब
मगर ये रंग बदलता हुआ सा कुछ तो है
जो मेरे वास्ते कल ज़हर बन के निकलेगा
तेरे लबों पे सँभलता हुआ सा कुछ तो है
ये अक्स पैकर-ए-सद-लम्स है नहीं न सही
किसी ख़याल में ढलता हुआ सा कुछ तो है
बदन को तोड़ के बाहर निकलना चाहता है
ये कुछ तो है ये मचलता हुआ सा कुछ तो है
किसी के वास्ते होगा पयाम या कोई क़हर
हमारे सर से ये टलता हुआ सा कुछ तो है
ये मैं नहीं न सही अपने सर्द बिस्तर पर
ये करवटें सी बदलता हुआ सा कुछ तो है
वो कुछ तो था मैं सहारा जिसे समझता था
ये मेरे साथ फिसलता हुआ सा कुछ तो है
बिखर रहा है फ़ज़ा में ये दूद रौशनी का
उधर पहाड़ के जलता हुआ सा कुछ तो है
मेरे वुजूद से जो कट रहा है गाम-ब-गाम
ये अपनी राह बदलता हुआ सा कुछ तो है
जो चाटता चला जाता है मुझ को ऐ 'बानी'
ये आस्तीन में पलता हुआ सा कुछ तो है
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तू कोई ग़म है तो दिल में जगह बना अपनी
तू इक सदा है तो एहसास की कमाँ से निकल
तू इक सदा है तो एहसास की कमाँ से निकल
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अजीब भीड़ यहाँ जम्अ' है यहाँ से निकल
कहीं भी चल मगर इस शहर-ए-बे-अमाँ से निकल
इक और राह उधर देख जा रही है वहीं
ये लोग आते रहेंगे तू दरमियाँ से निकल
ज़रा बढ़ा तो सही वाक़िआत को आगे
तिलिस्म-कारी-ए-आग़ाज़-ए-दास्ताँ से निकल
तू कोई ग़म है तो दिल में जगह बना अपनी
तू इक सदा है तो एहसास की कमाँ से निकल
यहीं कहीं तेरा दुश्मन छुपा है ऐ 'बानी'
कोई बहाना बना बज़्म-ए-दोस्ताँ से निकल
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वो एक अक्स कि पल भर नज़र में ठहरा था
तमाम उम्र का अब सिलसिला है मेरे लिए
तमाम उम्र का अब सिलसिला है मेरे लिए
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न मंज़िलें थीं न कुछ दिल में था न सर में था
अजब नज़ारा-ए-ला-सम्तियत नज़र में था
अजब नज़ारा-ए-ला-सम्तियत नज़र में था
इताब था किसी लम्हे का इक ज़माने पर
किसी को चैन न बाहर था और न घर में था
छुपा के ले गया दुनिया से अपने दिल के घाव
कि एक शख़्स बहुत ताक़ इस हुनर में था
किसी के लौटने की जब सदा सुनी तो खुला
कि मेरे साथ कोई और भी सफ़र में था
कभी मैं आब के तामीर-कर्दा क़स्र में हूँ
कभी हवा में बनाए हुए से घर में था
झिजक रहा था वो कहने से कोई बात ऐसी
मैं चुप खड़ा था कि सब कुछ मेरी नज़र में था
यही समझ के उसे ख़ुद सदा न दी मैं ने
वो तेज़-गाम किसी दूर के सफ़र में था
कभी हूँ तेरी ख़मोशी के कटते साहिल पर
कभी मैं लौटती आवाज़ के भँवर में था
हमारी आँख में आ कर बना इक अश्क वो रंग
जो बर्ग-ए-सब्ज़ के अंदर न शाख़-ए-तर में था
कोई भी घर में समझता न था मेरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
अभी न बरसे थे 'बानी' घिरे हुए बादल
मैं उड़ती ख़ाक की मानिंद रहगुज़र में था
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