मेरी मंज़िल का रास्ता मुझ को
एक पंछी दिखा रहा मुझ को
उस नगर से किया जुदा मुझ को
कोई अपना नहीं रहा मुझ को
तेरे पहलू से ख़ूब भटकाया
मेरी किस्मत ने जा-ब-जा मुझ को
हादसा ये भी कुछ जुदा सा है
बुझता दीपक जला रहा मुझ को
एक रिश्ता तबाह कर डाला
शक की दीमक ने खा लिया मुझ को
बाद जाने के आप के मिलता
हू-ब-हू कोई आप सा मुझ को
हाए पहचानता नहीं सोहिल
अब तो घर का भी आइना मुझ को
मैं किसी का बुरा चाहता ही नहीं
चाहना छोड़िए सोचता ही नहीं
ख़्वाब-हा-ख़्वाब जो मुझ से मिलता रहा
यार मैं तो उसे जानता ही नहीं
ढूँढते ढूँढते थक चुका यार मैं
अब ख़ुशी को कहीं ढूँढता ही नहीं
हैं बहुत से भले लोग याँ पे मगर
कोई मेरा भला चाहता ही नहीं
इस सदाक़त से सब लोग महरूम हैं
बे-सबब मैं कभी बोलता ही नहीं
कोई आह-ओ-फ़ुग़ाँ से है महरूम और
कोई बज़्म-ए-तरब देखता ही नहीं