राज़ तो आख़िर खुलना है अब
दो रोगी इक चारा-गर है
दो रोगी इक चारा-गर है
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थोड़ी ज़बान कड़वी हक़ीक़त में है मेरी
लेकिन मेरे हबीब मैं दिल का बुरा नहीं
लेकिन मेरे हबीब मैं दिल का बुरा नहीं
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हमारा दिल फ़क़त दिल ही नहीं सोहिल
ग़ज़ल का ख़ूब-सूरत कारख़ाना है
ग़ज़ल का ख़ूब-सूरत कारख़ाना है
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कोई कैसे बँधायेगा ढारस
हम जहाँ में कहाँ रो रहे हैं
हम जहाँ में कहाँ रो रहे हैं
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मेरी मंज़िल का रास्ता मुझ को
एक पंछी दिखा रहा मुझ को
एक पंछी दिखा रहा मुझ को
उस नगर से किया जुदा मुझ को
कोई अपना नहीं रहा मुझ को
तेरे पहलू से ख़ूब भटकाया
मेरी किस्मत ने जा-ब-जा मुझ को
हादसा ये भी कुछ जुदा सा है
बुझता दीपक जला रहा मुझ को
एक रिश्ता तबाह कर डाला
शक की दीमक ने खा लिया मुझ को
बा'द जाने के आप के मिलता
हू-ब-हू कोई आप सा मुझ को
हाए पहचानता नहीं सोहिल
अब तो घर का भी आइना मुझ को
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मैं किसी का बुरा चाहता ही नहीं
चाहना छोड़िए सोचता ही नहीं
चाहना छोड़िए सोचता ही नहीं
ख़्वाब-हा-ख़्वाब जो मुझ से मिलता रहा
यार मैं तो उसे जानता ही नहीं
ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक चुका यार मैं
अब ख़ुशी को कहीं ढूँढ़ता ही नहीं
हैं बहुत से भले लोग याँ पे मगर
कोई मेरा भला चाहता ही नहीं
इस सदाक़त से सब लोग महरूम हैं
बे-सबब मैं कभी बोलता ही नहीं
कोई आह-ओ-फ़ुग़ाँ से है महरूम और
कोई बज़्म-ए-तरब देखता ही नहीं
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