काम आई न कुछ दानिश-ओ-दानाई हमारीहारी है तेरे झूठ से सच्चाई हमारीयूँ है कि यहाँ नाम-ओ-निशाँ तक नहीं तेराऔर तुझ से भरी रहती है तन्हाई हमारी— Zafar Iqbal