मुक़द्दर और कितना आज़माऊँ मैं
तुझे जाना ही है तो क्यूँ बुलाऊँ मैं
तेरी उम्मीद ने इतना जलाया है
हुआ दिल राख अब कैसे जलाऊँ मैं
समंदर सूखकर सहरा हुआ है अब
मेरी आँखों को और कितना रुलाऊँ मैं
ज़बाँ पे तुम भी मेरा नाम रखते थे
छुपा तो था नहीं कुछ क्या बताऊँ मैं
हाँ रोका मरने से इक घर के रिश्ते ने
इजाज़त दे तो वो रिश्ता निभाऊँ मैं
महकता था चमन इक गुल महकने से
चली जा दूर तो फिर मुस्कुराऊँ मैं
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