100rav
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Ghazal

मुक़द्दर और कितना आज़माऊँ मैं

तुझे जाना ही है तो क्यूँ बुलाऊँ मैं

तेरी उम्मीद ने इतना जलाया है
हुआ दिल राख अब कैसे जलाऊँ मैं

समुंदर सूखकर सहरा हुआ है अब
मेरी आँखों को और कितना रुलाऊँ मैं

ज़बाँ पे तुम भी मेरा नाम रखते थे
छुपा तो था नहीं कुछ क्या बताऊँ मैं

हाँ रोका मरने से इक घर के रिश्ते ने
इजाज़त दे तो वो रिश्ता निभाऊँ मैं

महकता था चमन इक गुल महकने से
चली जा दूर तो फिर मुस्कुराऊँ मैं

— 100rav

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