मेरा दिल यार हिम्मत क्यूँ नहीं करता
नज़र से ही इबारत क्यूँ नहीं करता
पलट कर देखती हैं यार वो भी जब
बता कर ज़ीस्त जन्नत क्यूँ नहीं करता
मोहब्बत हम-सफ़र बनकर नहीं है जब
तू जोरू से मोहब्बत क्यूँ नहीं करता
ज़काती ग़म में है मारूफ़ होकर अब
ख़ुदा मैं ख़ैर-बरकत क्यूँ नहीं करता
उसे हक़ है मोहब्बत का किसी से भी
है ग़म में सब कि नफ़रत क्यूँ नहीं करता
मिली जब मौत थी हैरत में ये सौरभ
तू कोई भी शिकायत क्यूँ नहीं करता
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