उस के कंगन उस के झुमके उस की चूड़ी अच्छी है
गोरे तन पर उस के फिर वो साड़ी नीली अच्छी है
गाल गुलाबी नागिन ज़ुल्फ़ें चाल नदी सी क्या बोलें
क्या-क्या तुम को बतलाएँ वो तो पूरी ही अच्छी है
मैं ने बोला आओ चल कर हम तुम पिज़्ज़ा खाते हैं
वो बोली मॉडर्न के पास में छोला पूड़ी अच्छी है
उस के संग गए थे इक दिन हम कतकी के मेले में
एक फ़कीर कहा था मुझ से बेटा जोड़ी अच्छी है
अब क्या अपनी नज़्मों में उस को मैं धोखेबाज़ कहूँ
उस की भी अपनी मर्ज़ी है वैसे लड़की अच्छी है
इक-तरफ़ा मैं प्यार करुँ या जा कर के इनकार सुनूँ
एक सुख़न-वर की ख़ातिर ये भी बेचैनी अच्छी है
— Prashant Arahat















