kabhi gopi ko chheda tha kabhi makhan chur | कभी गोपी को छेड़ा था कभी मक्खन चुराए थे

  - Arohi Tripathi

कभी गोपी को छेड़ा था कभी मक्खन चुराए थे
कभी वो मौन धारण थे कभी बंसी बजाए थे

हुए अर्जुन अगर तन्हा तो कान्हा ने हिदायत दी
यही तो धर्म है बंदे महाभारत हराए थे

भटकता मन बड़े चंचल यशोदा के दुलारे थे
वही अवतार हैं जिसने यहाँ गोकुल बसाए थे

मोहब्बत हो गई जिनसे उन्हें भूले नहीं थे वो
यही तो ख़ासियत थी उनकी वो दिल में समाए थे

पुजारिन हूँ जी मोहन की दिवानी हूँ जी मोहन की
यहाँ मीरा तरसती थी वहाँ वो भी सताए थे

हमारा मन नहीं लगता बड़ी बेचैन रहती हूँ
हमें पागल किया कान्हा हमारे घर को आए थे

  - Arohi Tripathi

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