कोई ढंग का काम कर पाऊँगा क्या
या ऐसे ही गुमनाम मर जाऊँगा क्या
उठी तन से आवाज़ ये जय सियाराम
मैं मन में मेरे राम भर पाऊँगा क्या
ये माँ बाप की लाज ही ख़ुद-कुशी है
कभी हो के बदनाम घर जाऊँगा क्या
कमी ख़त्म होनी नहीं थी कभी भी
पता हो तो मैं काम पर आऊँगा क्या
गुनाहों को मेरे मैं ख़ुद मान लूँगा
"धरम" हूँ मैं इल्ज़ाम सरकाऊँगा क्या
— "Dharam" Barot















