"Dharam"  Barot

"Dharam" Barot

@Dham_barot85

"Dharmendra Barot" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in "Dharmendra Barot"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

गरीबों से फ़क़त वादे किए जाते हैं नेताजी गरीबों की ज़रूरत भी ज़रा सा हौसला तो है — "Dharam" Barot
मीर ग़ालिब को समझ पाता नहीं मैं मसअले मेरे बहुत हैं ख़ुद के ही दोस्त — "Dharam" Barot
डर ज़िंदगी में कौन रखना चाहता क्यूँ तू जवानी मौन रखना चाहता — "Dharam" Barot
दो लड़ रहे मुल्कों में से कैसा चुनाव इंसानियत को मार हिंसा का चुनाव — "Dharam" Barot
साथ चलने वाले सारे रुक गए थे ज़िंदगी को जल्द जाना था जिन्होंने — "Dharam" Barot
क़ैद कर के मत करे आज़ाद मुझ को अब हुनर बाक़ी नहीं उड़ने का मुझ में — "Dharam" Barot
परंपरा बदल गई बढ़े हैं दाम काँसे के फ़क़ीरों ने बदल दिया है ख़ुद को बनियों की तरह — "Dharam" Barot
चंद हैं जो करते हैं हरदम बुराई बस मेरी बाक़ी सब को काम से ही काम होता है मेरा — "Dharam" Barot
महादेव ने है सिखाया हमें तो रखो ज़हर को कंठ में, मत उबालो — "Dharam" Barot
हार कर हँसना हुनर है खेल का जंग में बाज़ी लगी थी जान की — "Dharam" Barot
नए साल पर भी है इतनी उदासी नहीं जा रहा घर कमाई है भारी — "Dharam" Barot
पिता बच्चों की हर विश पूरी करने में लगा है गगन जैसी भी ख़्वाहिश पूरी करने में लगा है — "Dharam" Barot
जाने वाले इश्क़ समझा जाते हैं पास थोड़ी साथ रहता है ख़ुदा — "Dharam" Barot
मोर्चा हम ने सँभाला है ये भी इक वहम था खेल हर दिन ही पलट देता खिलाड़ी इक नया — "Dharam" Barot
याद मुझ को कोई भी करता नहीं है दिल से यारों इश्क़ इक से करने का अंजाम ये भुगता था मैं ने — "Dharam" Barot
था मुश्त-ए-ख़ाक का ये जिस्म मुश्त-ए-ख़ाक बन जाना इसे आख़िर में जाना क़ब्र में या राख बन जाना — "Dharam" Barot
बने हैं मर्द औरत को समझने नहीं समझी कभी औरत को औरत — "Dharam" Barot

Ghazal

Nazm

"वुजूद" पेड़ थोड़े पहले काटे जाते थे घोंसले भी टूट गिर जाते थे उड़के सारे ही पंछी खो जाते थे गाँव को फिर शहर घोषित करना था घर बनाया था वहाँ इंसान ने कुछ जगह भी छोड़ता था खेलने उस जगह अब बच्चे हैं खेलते दूर से इक जाँ थी ये सब देखती आँख थी ग़मगीन उस की देख कर उस पे पड़ती है नज़र बच्चे की इक वो पंछी शायद उन्हीं में से था जो पेड़ टूटे थे महीनों पहले सब घोंसला उस का तभी टूटा था यार बच्चा इक दिन उस को पकड़ लेता है पिंजरा भी वास्ते उस के था अब उस को हर दिन अच्छा खाना मिलता था ख़ुश था या ग़म में पता लगना भी अब थोड़ा मुश्किल लग रहा है यार अब बच्चे को ये लग रहा था वो पंछी को बड़ा ख़ुश रख रहा था बाप को बच्चा ख़ुश दिखता था आस-पास जब पंछी के रहता था घर बना पेड़ का गिरना ये अब मालिक भी और पिंजरे में रहता पंछी भी सब भूले बस ग़ुलामी नाम का मतलब यही बस ज़रा सी ही ख़ुशी पाकर सभी ये भूल जाते था क्या अपना वुजूद — "Dharam" Barot