अब छोड़ कर सारी बुराई शायरी पर ध्यान दो
कुछ मत करो पर थोड़ा सा जी आप मुझको मान दो
जब 'इश्क़ का मतलब ही कुछ भी करने को तैयार हम
फिर क्यूँ किसी से भी जताना जान लो या जान दो
ये ख़ुदकुशी को कोई अच्छे से समझ पाया नहीं
हर दम पुकारे रूह अंदर जिस्म मुझको दान दो
मुझको ग़लत इक रास्ता चुनना है वो भी 'इश्क़ का
आओ मुझे भी कोई आकर थोड़ा सा पर ज्ञान दो
अब थक गया हर दिन बुराई सुन के लोगों से धरम
भगवान मुझ सेे कुछ बुराई हो न ये वरदान दो
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