मेरे अपने मैं ने गॅंवाए हुए हैं
ये मेहनत से पैसे कमाए हुए हैं
तू सुख है मेरे पास थोड़ी रुकेगा
ये दुख मेरे ख़ुद के बनाए हुए हैं
जो ग़लती की थी वो क़ुबूली थी मैं ने
ये लांछन किसी के लगाए हुए हैं
कमी और वो भी बहुत सारी मुझ
में
तभी लौट कर आप आए हुए हैं
नहीं सूख जाती ये ऐसी ही आँखें
धरम ने बहुत घाव खाए हुए हैं
— "Dharam" Barot















