अच्छे अच्छों को यहाँ हम भूल जाते
टूट जाते हैं तभी मक़बूल नाते
मानकर पश्ती पढ़ाई छोड़ दी थी
उन किताबों के वो बक्से धूल खाते
बा'द पतझड़ के नई रुत है बहाराँ
जब उदासी पर ख़ुशी के फूल आते
थक गया जीना नहीं है और मुझ को
इस दवाई के जगह फल फूल लाते
लोग जीते जी नहीं कर पाएँगे ये
बा'द उस के फिर उठा मक़्तूल जाते
— "Dharam" Barot















