मोहब्बत ही मोहब्बत चाहिए थी
कहाँ किस को ये नफ़रत चाहिए थी
कभी पिंजरे में रुकने थे परिंदे
मोहब्बत को नई छत चाहिए थी
मिले मेहनत से जितना वो हैं काफ़ी
अना के साथ दौलत चाहिए थी
धड़कता था जो तेरे पास धक धक
मुझे दिल में वो हरकत चाहिए थी
रहे बाक़ी मेरे इस जिस्म में जान
मुझे तब तक तेरी लत चाहिए थी
— "Dharam" Barot















