आधा भरा सा ग्लास भी आधी हवा से था भरा
हाँ ज़िंदगी का ग्लास भी था ऐसे ही पूरा भरा
एग़्ज़ाम में ये पूछना तो बनता था उस सेे कि यार
पेपर अधूरा छूटा या आराम से पूरा भरा
इंसान फ़ितरत से ही ऐसा होता मैं भी आ गया
लगता नहीं है ये पता मन में मेरे क्या क्या भरा
ये खेल सारा मानने का ही पता ये चल गया
फिर इक अधूरा शख़्स भी लगने लगा पूरा भरा
अच्छाई में भी ढूँढ़ लेता था बुराई वो तुरंत
सच कहता था तू ये 'धरम' अच्छा नहीं ज़्यादा भरा
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