लिख के पेंसिल से सभी जैसे सुधारें

ग़लतियों को ख़ुद की हम वैसे सुधारें

ग़म नहीं मेरे बदलते जानता हूँ
मेरे कुछ हालात तो पैसे सुधारें

बात ये कहनी ग़लत है दोस्ती में
दोस्तों को और हम कैसे सुधारें

सच में भी जो ढूँढ़ते ग़लती कहेंगे
बातों को ऐसे नहीं वैसे सुधारें

वक़्त के इस खेल में हम फ़ेल सारे
झूठ है सब वक़्त को ऐसे सुधारें

— "Dharam" Barot

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