ये तीर को कमान से निकलने दो
अहम को मेरी जान से निकलने दो
सुने मगर अमल न करने जैसी हो
वो बातें दूजे कान से निकलने दो
नहीं सुनेगा इश्क़ में है वो अभी
उसे ज़रा सा ध्यान से निकलने दो
मैं उड़ना चाहता था उड़ के फँस गया
मुझे ये आसमान से निकलने दो
बना रहा मैं इंस इतनी भीड़ में
ये काफ़ी है सो शान से निकलने दो
— "Dharam" Barot















