बोझ ख़ुद पर बढ़ गया था हदस ज़्यादा
काम भी करने चला था क़दस ज़्यादा
इक ग़ज़ल होती मुक़म्मल बाद उसके
मिलती है मुझको ख़ुशी आमदस ज़्यादा
दोस्त में भी जब दिखेगी जात समझो
बात हल्की कर रहे हो बदस ज़्यादा
मीडिया का भी यही है काम अब पर
शोर कर पाते नहीं संसदस ज़्यादा
जब इरादा पक्का हो तो फिर धरम को
सोचना पड़ता है कुछ शायदस ज़्यादा
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