bol ke kalyug hai satyug ko bhagaaya tha kisi ne | बोल के कलयुग है सतयुग को भगाया था किसी ने

  - "Dharam" Barot

बोल के कलयुग है सतयुग को भगाया था किसी ने
धीरे से ऐसे बुराई को जगाया था किसी ने

कोई ऐसे ही अकेला हो नहीं जाता कभी भी
एक बारी भी गले दिल से लगाया था किसी ने

मेरी राहें तेरे तक है तुझ पे ही तो मेरा हक़ है
वास्ते मेरे ये गाना दिल से गाया था किसी ने

जो कहानी है सुनाई एक तक रुकनी नहीं थी
प्रेम का प्रस्ताव मेरा भी फगाया था किसी ने

ठोकरें देकर 'धरम' को ठोस करने को नमन है
ज़िंदगी का दीप ऐसे जगमगाया था किसी ने

  - "Dharam" Barot

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