दुखी लोगों का दुख कब कौन समझे
वही मेरा जो मेरा मौन समझे
नहीं है डर नहीं है कोई सम्मान
कहाँ से बैअत-ए-फ़िरऔन समझे
समझकर भी रुके इस बात पर हम
ये दोनों में से पहले कौन समझे
अकेलापन अकेले झेलना था
अकेलेपन का आलम कौन समझे
नवाज़ा था हुनर से उस ख़ुदा ने
किसी को भी धरम क्यूँ गौन समझे
— "Dharam" Barot















