अना और रिश्ता नहीं रहते दो साथ

तुम्हें सोच कर छोड़ना होगा इक हाथ

नहीं चाहिए कोई भी तर्क मुझ को
मेरी आस्था है सो है वो मेरा नाथ

छुओ जिस्म पर जब उसे याद करना
नहीं करनी है कोई भी रात की बात

है कुछ लोग ही गाँव में खेत बोने
तुम्हें भी हुआ शहर का मोह बरसात

ज़रूरत है क्या समझा था देर से मैं
मेरे उम्र के साथ बदले थे जज़्बात

— "Dharam" Barot

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