मोहब्बत को पराई कर रही हो

सुना है तुम सगाई कर रही हो

यहाँ बस ज़िंदगी इक तीरगी है
वहाँ तुम मुँह-दिखाई कर रही हो

क़फ़स मायूस हो कर रो रहा है
परिंदे की रिहाई कर रही हो

ग़म-ए-दुनिया से आगे कुछ नहीं है
जहाँ तुम आशनाई कर रही हो

— Rohit Gustakh

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