लड़ रहे साँस से ज़िंदगी के लिए
दिल जलाते रहे रौशनी के लिए
ग़म उठाता रहा उम्र भर फ़ाएदा
चंद पल की हँसी और ख़ुशी के लिए
साहिलों से कभी नाख़ुदास कभी
हम ने की दोस्ती इक नदी के लिए
है बड़ा ही कठिन काम दुनिया में ये
ढूँढ़ना आदमी आदमी के लिए
ये बिछड़ते हुए कह गई दिल-रुबा
तुम बने हो मियाँ शा'इरी के लिए
वक़्त की थी कमी गर्दिशों के थे दिन
वक़्त देना पड़ा हर किसी के लिए
याद है ना तुम्हें बात ‘गुस्ताख़’ की
बुज़दिली चाहिए ख़ुद-कुशी के लिए
— Rohit Gustakh















