zindagi de dard mujhko kam zaraa | ज़िंदगी दे दर्द मुझको कम ज़रा

  - Lalit Mohan Joshi

ज़िंदगी दे दर्द मुझको कम ज़रा
आशिक़ी दे दर्द मुझको कम ज़रा

है समंदर क्यूँ रुलाता रोज़ फिर
तिश्नगी दे दर्द मुझको कम ज़रा

तपती गर्मी हो रहा देखो ये हाल
तफ़्तगी दे दर्द मुझको कम ज़रा

संग बहती जा रही बेजान लाश
ऐ नदी दे दर्द मुझको कम ज़रा

चल रहा है दौर ऐसी बात का
आदमी दे दर्द मुझको कम ज़रा

किसलिए अब रो रहे हैं सब के सब
मौत भी दे दर्द मुझको कम ज़रा

यार तन्हाई में लब ख़ामोश हैं
ख़ामुशी दे दर्द मुझको कम ज़रा

ज़िंदगी से भी मुझे तो प्यार था
प्यार भी दे दर्द मुझको कम ज़रा

  - Lalit Mohan Joshi

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