कुछ न कुछ तो निस्बत है
बैर है या उल्फ़त है
हश्र का ये दिन और तुम
क्या हसीं क़यामत है
रंज क्यूँँ करे इस पर
अपनी अपनी क़िस्मत है
कोई तो कहे मुझ से
आप से मोहब्बत है
मय-कदा भी मंदिर है
साक़ी उस की मूरत है
ईद मेरी हो जाए
चाँद की ज़रूरत है
ज़ीस्त तू जिसे कहता
चार-दिन की मोहलत है
ज़िंदगी फ़साना है
मौत ही हक़ीक़त है
आते रहना तुर्बत पर
आख़िरी वसीयत है
ये ग़ज़ल नहीं 'ज़ामी'
ज़िंदगी की दौलत है
आ गया ख़ुदा का ख़त
'ज़ामी' की ज़रूरत है
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