Prit
Prit
Ghazal

आज करता हूँ बात फूलों की

बात में है सिफ़ात फूलों की

उस के चेहरे पे रंग फूलों का
उस के होंठों पे बात फूलों की

पैरहन उस का साफ़ पानी है
उस का पर्दा क़नात फूलों की

जब कभी उस का ज़िक्र हो आया
छेड़ दी हम ने बात फूलों की

मेरी आँखों में ख़्वाब फूलों का
उस के बिस्तर पे रात फूलों की

किस ने जाना है दर्द फूलों का
कौन समझा है बात फूलों की

उन पे लिखनी थी इक ग़ज़ल हम को
हम ने लिख दी सिफ़ात फूलों की

कभी ब्याही थी बेटियाँ हम ने
कभी की थी ज़कात फूलों की

— Prit

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