आज करता हूँ बात फूलों की
बात में है सिफ़ात फूलों की
उसके चेहरे पे रंग फूलों का
उसके होंठों पे बात फूलों की
पैरहन उसका साफ़ पानी है
उसका पर्दा क़नात फूलों की
जब कभी उसका ज़िक्र हो आया
छेड़ दी हमने बात फूलों की
मेरी आँखों में ख़्वाब फूलों का
उसके बिस्तर पे रात फूलों की
किसने जाना है दर्द फूलों का
कौन समझा है बात फूलों की
उन पे लिखनी थी इक ग़ज़ल हमको
हमने लिख दी सिफ़ात फूलों की
कभी ब्याही थी बेटियाँ हमने
कभी की थी ज़कात फूलों की
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