हर ज़ुल्म ढाते हैं वो मुहब्बत के नाम पर
फिर छीनते हैं रूह भी हिजरत के नाम पर
और सीखने थे क़ायदे हम को तो इश्क़ के
पर हम ने सीखा शिर्क इबादत के नाम पर
कहते थे ख़ुद को दोस्त हूँ मैं दोस्त हूँ तिरा
लग्ज़िश सिखा गए हैं वो ग़ैरत के नाम पर
क्या इस तरह लिखी गई थी उस की ज़िन्दगी
होती है रोज़ दफ़्न जो इज़्ज़त के नाम पर
ये मसअला नहीं है मियाँ धर्म का कोई
मशरूत हूँ मैं कुंबा की इज़्ज़त के नाम पर
ज्यूँ ही ख़याल आया के पढ़ लिख के कुछ बनूँ
सब लूट ले गया कोई शोहरत के नाम पर
दम तोड़ते हैं गोद में ही ख़्वाब आजकल
पलते थे मुझ
में जो कभी आदत के नाम पर
चलना था हम को रोज़ 'सबा' वक़्त की तरह
पर सो गए हैं चैन से क़िस्मत के नाम पर















