कह के क़िस्सा ख़त्म कर दे प्यार का - Shajar Abbas

कह के क़िस्सा ख़त्म कर दे प्यार का
दिल नहीं करता तिरे दीदार का

फूल गिरते हैं चमन में शाख़ से
शीरीं लहजा सुन के मेरे यार का

जब सवाल-ए-बैअत-ए-फासिक़ हुआ
लफ़्ज़ निकला मुँह से बस इनकार का

कोई नईं आया यहाँ पर पूछने
हाल हाए मुफ़लिस-ओ-बीमार का

ये हक़ीक़त है क़सम से दोस्तों
इश्क़ में अपना मज़ा है हार का

एक दिन झुँझला के वो कहने लगा
क्या करूँ मसलक की इस दीवार का

तज़किरा यारों में है शाम-ओ-सहर
आपके तिल वाले इस रुख़सार का

गुल सा नाज़ुक था जो मुर्शद कल तलक
रूप उसने ले लिया है ख़ार का

काम लेता है निगाह-ए-मस्त से
देखिए वो शख़्स अब तलवार का

हक़ बयानी अब नहीं करना कोई
हुक्म आया है अभी सरकार का

ऐ शजर देखो फ़राज़-ए-दार पर
दबदबा है मीसम-ए-तम्मार का

- Shajar Abbas
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