मुख़्तसर दास्ताँ हमारी हैज़िंदगी राएगाँ हमारी हैये हमें क्यूँ क़रार आता नहींजान अटकी कहाँ हमारी हैये ग़ज़ल इक खुली किताब है औरये ग़ज़ल राज़दाँ हमारी हैअब तो जो भी है कुछ तुम्हारा हैज़ात भी अब कहाँ हमारी है— Sumit Panchal